Friday, October 6, 2017

इनेलो प्रतिनिधिमंडल ने दादूपुर नलवी नहर मामले को लेकर राज्यपाल को सौंपा ज्ञापन 


चंडीगढ़, 6 अक्तूबर: नेता विपक्ष अभय सिंह चौटाला, इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के प्रदेशाध्यक्ष अशोक अरोड़ा, पार्टी के वरिष्ठ नेता रामपाल माजरा और अन्य वरिष्ठ नेताओं के अगुवाई में इनेलो ने आज हरियाणा के राज्यपाल मान्यवर प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी को एक ज्ञापन देते हुए मांग की कि दादुपुर-नलवी सिंचाई परियोजना को रद्द करने बारे अपने निर्णय को हरियाणा सरकार तुरंत वापिस ले। 
दादुपुर-नलवी सिंचाई परियोजना की पृष्ठभूमि से मान्यवर राज्यपाल को अवगत कराते हुए ज्ञापन में कहा गया कि दक्षिण हरियाणा जल संसाधन के मामले में पहले ही ‘डार्कजोन’ में घोषित किया जा चुका है और उत्तर हरियाणा, जिसमें यमुनानगर, अम्बाला और कुरुक्षेत्र जिले भी शामिल हैं वह इस विषय में ‘क्रिटिकल जोन’ घोषित किया जा चुका है। इसी कारण दादुपुर-नलवी सिंचाई परियोजना इन जिलों के लिए विशेष महत्व रखती है क्योंकि इससे न केवल 2.25 लाख एकड़ भूमि की सिंचाई सम्भव होनी थी बल्कि उससे उस समूचे क्षेत्र के भू-जल स्तर पर भी अनुकूल प्रभाव पडऩा था। प्रदेश की बढ़ती जनसंख्या और नगरीकरण की प्रक्रिया को देखते हुए इसी परियोजना के कारण इस क्षेत्र की पेयजल आपूर्ति का भी सकारात्मक समाधान होना था। 
ज्ञापन में कहा गया कि इन चुनौतियों से जूझने के लिए वर्ष 1985 में दादुपुर-नलवी सिंचाई परियोजना की परिकल्पना की गई थी। परंतु इस पर पहली बार गम्भीरतापूर्वक प्रयास 1987 में हुए जिससे वर्ष 1991 तक इसके लिए आवश्यक भूमिका अधिग्रहण किया गया। दुर्भाग्य से उसके उपरांत वर्षं 1999 तक इस परियोजना पर कोई काम नहीं किया गया और फिर 2004 में जब केंद्रीय जल आयोग से इस परियोजना की अनुमति प्राप्त हुई तभी इसे पुनर्जीवित किया गया और नवम्बर 2004 में इसकी आधारशीला रखी गई। 
ज्ञापन में आगे कहा गया कि वर्ष 2005 में सरकार बदलने के बाद इस परियोजना को फिर भुला दिया और फिर अंतत: केंद्र सरकार के प्रश्नों से बचने के लिए सरकार ने यह निर्णय लिया कि उसे केंद्रीय जल आयोग की सहायता और सहयोग की इस कारण आवश्यकता नहीं क्योंकि इसे पूर्णत: राज्य सरकार द्वारा ही लागू किया जाएगा। आज वस्तुस्थिति यह है कि 1019 एकड़ भूमि का अधिग्रहण करने के बाद परियोजना का पहला चरण पूरा हो चुका है, दूसरे चरण का भी निर्माण कार्य जारी था और इस पर लगभग 209 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं।
परंतु अधिग्रहण की प्रक्रिया से प्रभावित कुछ किसान मुआवजे को लेकर पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में याचिका लेकर गए थे जिसका अभी कुछ समय पूर्व ही निर्णय करते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिए कि वह किसानों को मुआवजे की रकम बढ़ाकर दे। यह दुर्भाग्य की बात है कि माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय को लागू करने के बजाय सरकार ने यह उचित समझा वह एक ऐसा जनविरोधी निर्णय ले जिसका प्रतिकूल प्रभाव न केवल किसानों के कल्याण पर होगा बल्कि वह इस क्षेत्र के लिए पेयजल के संकट को भी उत्पन्न करेगा।
अत: सरकार ने परियोजना को रद्द करते हुए अधिग्रहित भूमि को भी डी-नोटिफाई करने का जनविरोधी निर्णय लिया। यहां यह बताना अनुचित नहीं होगा कि इसी वर्ष 22 सितम्बर को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह निर्णय किया गया है कि अधिग्रहण के उपरांत उस भूमि को न ही डीनोटीफाई किया जा सकता है और न ही मुआवजे की रकम को देने में 6 हफ्ते से अधिक का विलंब किया जा सकता है। इस निर्णय के दृष्टिगत सरकार का इस परियोजना के लिए अधिगृहित भूमि को रद्द कर उसे लौटाने का कोई कानूनी आधार नहीं है। 
ज्ञापन में कहा गया कि यह देखते हुए कि दक्षिण हरियाणा पहले ही डार्कजोन घोषित किया जा चुका है और उत्तर हरियाणा उस दिशा में बड़ी तेजी से बढ़ रहा है तो यदि सरकार द्वारा भू-जल स्तर में वृद्धि करने के सार्थक प्रयास न किए गए तो हरियाणा जिसकी अपनी विशिष्ठ पहचान उसकी उत्तम खेती और दूध और घी से बनती थी वह शीघ्र ही बंजर भूमि में बदल जाएगा। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार का यह नैतिक और संवैधानिक कर्तव्य है कि वह ऐसे सार्थक कदम उठाए जिससे प्रदेश को इस संकट से बचाया जा सके।

No comments:

Post a Comment